Tuesday, January 30, 2024

कवि की अग्नि-परीक्षा

जीवक चिंतामणि को तमिल का श्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है। इसके रचनाकार जैन संत-कवि तिरुतक्कदेवर पहले मैलापुर (मद्रास) में रहा करते थे। बाद में वे तत्कालीन विद्वानों की परिषद् ‘मदुरै संगम’ के सदस्य बन गये थे। एक बार संगम में किसी ने कह दिया कि जैन कवि शृंगार रस प्रधान काव्य-रचना में असमर्थ होते हैं। इस पर युवा विद्वान तिरुतक्कदेवर ने स्पष्टीकरण किया कि जैन रचनाकार शृंगार रस प्रधान काव्य लिखने की योग्यता नहीं रखते, ऐसा कहना ठीक नहीं है। सच्चाई यह है कि वे इससे भी अधिक महत्व के विषयों पर लेखनी चलाते हैं। इस बात से संगम के सदस्य संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने युवा कवि तिरुतक्कदेवर की हँसी उड़ाई और उन्हें चुनौती दी। तिरुतक्कदेवर ने अपने गुरु की आज्ञा लेकर चुनौती स्वीकार की। इसी चुनौती के फलस्वरूप उन्होंने ‘जीवक चिंतामणि’ महाकाव्य की रचना की। चार पंक्तियों के कुल 3145 पदों के इस ग्रंथ में कवि ने पहली बार विरुत्तम (वृत्त) छंद का प्रयोग किया। 

जब यह महाकाव्य संगम में प्रस्तुत हुआ तो विद्वान चकित हो गये। कुछ पंडितों ने तिरुतक्कदेवर के चरित्र पर सवाल किया कि ब्रह्मचर्य और सादगीमय जीवन जीने वाला युवाकवि ऐसा शृंगार रस प्रधान काव्य कैसे लिख सकता है? इस पर तिरुतक्कदेवर की परीक्षा ली गई। निर्दोष सिद्ध करने के लिए उनकी हथेली पर अग्नि से लाल तप्त लोहे का एक गोला रखा गया और कहा गया कि यदि वे अपवित्र हैं तो उनका हाथ जल जाए! तिरुतक्कदेवर अपनी इस परीक्षा में पूर्ण उत्तीर्ण हुए। संगम के सभी सदस्यों ने तिरुतक्कदेवर की विलक्षण काव्य-प्रतिभा का लोहा माना। 

संस्कृत, तमिल, हिंदी और मराठी के विद्वान श्रीनिवासाचार्य के अनुसार ‘‘जीवक चिंतामणि के पद-लालित्य और अर्थ-गौरव के साथ होड़ करने वाला दूसरा महाकाव्य अब तक तमिल में नहीं हुआ।’’ डॉ. एम. शेषन के शब्दों में- ‘‘इस काव्य में विशेष सौन्दर्य के कारण तमिल भाषा में एक नई आभा प्रदर्शित हुई। वास्तव में तमिल भाषा और साहित्य के लिए यह एक अमूल्य अवदान माना जाता है। कल्पना की सुंदरता, विचारों की गहराई, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि काव्यालंकारों के सुंदर प्रयोग से यह एक अतुलनीय काव्य बन गया।’’ नौवीं सदी के इस शृंगार-शांत रस प्रधान महाकाव्य का प्रभाव तमिल भाषा की प्रथम कम्ब रामायण पर भी हुआ। परवर्ती कवियों के लिए यह आदर्श अनुकरणीय ग्रंथ बन गया। 

- डॉ. दिलीप धींग

शोध-प्रमुख: जैनविद्या विभाग, 

शसुन जैन कॉलेज, चेन्नई-17


Saturday, January 27, 2024

महान लक्ष्य को समर्पित मैत्री

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और दानवीर भामाशाह बालसखा थे। प्रताप के पिता राणा उदयसिंह का उनकी एक रानी पर अधिक मोह था। उन्होंने उस रानी के पुत्र जगमाल को युवराज बना दिया था। प्रताप को तो यही लग रहा था कि उन्हें राजगद्दी नहीं मिलेगी। उदयसिंह के निधन के बाद प्रताप के राजतिलक की चर्चा हुई। उस समय प्रताप के धनी-मानी मित्र भामाशाह ने प्रताप को मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठाने में पूर्ण योगदान किया। 

अकबर ने प्रताप को कमजोर करने के लिए कई लोगों को अपने पक्ष में कर लिया था। अकबर के प्रलोभन में प्रताप के भाई और अनेक राजपूत भी अकबर से जा मिले। अकबर ने प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी भामाशाह को भी अपने पक्ष में करने के खूब प्रयत्न किये। लेकिन देशभक्त भामाशाह ने अकबर के वैभवशाली जीवन के सारे प्रलोभनों को ठुकराकर प्रताप के साथ मैत्री को निभाया।  

धन के अभाव में जब प्रताप चिंतित थे तब, विपदा की घड़ियों में भामाशाह ने अपनी समस्त निजी संपत्ति महाराणा को समर्पित करके इतिहास की धारा ही मोड़ दी। जैन धर्मावलम्बी भामाशाह ने हल्दीघाटी युद्ध में अपना शौर्य प्रदर्शित करके यह सिद्ध किया कि अहिंसा, वीरता की पर्याय है। दिवेर युद्ध-विजय में भी त्याग व तलवार के धनी भामाशाह और उनके अनुज ताराचंद की मुख्य भूमिका रही थी। हल्दीघाटी युद्ध में घायल महाराणा प्रताप को युद्ध के मैदान से सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने में भी भामाशाह और ताराचंद ने गहरी सूझबूझ और त्वरित निर्णय-क्षमता का परिचय दिया था। 

हल्दीघाटी युद्ध के बाद प्रताप ने भामाशाह को मेवाड़ का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। महाराणा के इस निर्णय से मेवाड़ की चहुँमुखी प्रगति के द्वार खुल गये। मेवाड़ उद्धारक भामाशाह और महाराणा प्रताप ने अपनी मित्रता को विकट से विकट घड़ियों में भी आजीवन निभाया। किसी भी प्रकार का सुख-दुःख उनकी मैत्री में बाधक नहीं बना। दोनों महापुरुषों की मैत्री महान लक्ष्य को समर्पित रही। 

- डॉ. दिलीप धींग


Tuesday, January 16, 2024

छोटे-से गाँव से अंतरराष्ट्रीय सफर 

 


शाकाहारी जीवनशैली का प्रेरक पर्व पोंगल

समस्त तमिल लोकजीवन में सामाजिक समरसता का महान पर्व है- पोंगल। इसे तीन दिनों तक मिलजुलकर मनाया जाता है। इस पर्व के उपलक्ष्य में तीन दिन तक राजकीय अवकाश रहता है। इसका एक दिन तिरुवल्लुवर दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो विख्यात तमिल नीतिग्रंथ तिरुकुरल के रचनाकार थे। जैन विद्वान तिरुवल्लुवर ने तिरुकुरल में बड़े ही सुंदर तरीके से वर्षा, खेती-बाड़ी और शाकाहार का अंतर्संबंध और महत्व बताया है। जैन ग्रंथों के अनुसार प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने सभ्यता के आरंभ में लोगों खेती करना सिखाया और शाकाहारी जीवनशैली का प्रतिपादन किया। तमिलनाडु में यह प्रभाव कई रूपों में देखा जा सकता है।

पोंगल के बहुत सारे लौकिक और सामाजिक पक्षों में एक पक्ष यह है कि यह पर्व मवेशियों के प्रति प्रेम और आभार व्यक्त करने का पर्व भी है। मासिक तमिल पत्रिका ‘मुकुडै’ के संपादक प्रो. कनक अजितदास जैन के अनुसार गांवों में रहने वाले अधिकांश तमिल जैन बंधुओं का मुख्य व्यवसाय खेती है और हर परिवार में गाय, भैंस आदि पशु भी उनके परिवार के सदस्यों की तरह रहते हैं। ये मवेशी उनकी खेती-बाड़ी में सहयोगी होते हैं।
पोंगल के दौरान एक दिन मवेशियों के प्रति आभार प्रकट किया जाता है। उन्हें सजाया जाता है, अच्छा खिलाया-पिलाया जाता है एवं एक दिन के लिए किसी भी कार्य में नहीं लगाया जाता है। वस्तुतः पोंगल के उपलक्ष्य में मवेशियों को भी काम से अवकाश दिया जाता है। सजे-धजे मवेशियों को गांव में घुमाया जाता है। जिसका मवेशी अधिक स्वस्थ, प्रसन्न और बढ़िया होता है, उसकी प्रशंसा होती है, जिससे उपकारी पशुओं की उचित देखभाल की सबको प्रेरणा मिले। यह परंपरा समस्त तमिल समुदाय में है। पोंगल के अनेक खूबसूरत पहलुओं में मनुष्येत्तर प्राणियों के प्रति कृतज्ञता का पक्ष सचमुच बहुत ही रोचक और प्रेरक है।
- डॉ. दिलीप धींग

कवि की अग्नि-परीक्षा

जीवक चिंतामणि को तमिल का श्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है। इसके रचनाकार जैन संत-कवि तिरुतक्कदेवर पहले मैलापुर (मद्रास) में रहा करते थे। बाद में...