जीवक चिंतामणि को तमिल का श्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है। इसके रचनाकार जैन संत-कवि तिरुतक्कदेवर पहले मैलापुर (मद्रास) में रहा करते थे। बाद में वे तत्कालीन विद्वानों की परिषद् ‘मदुरै संगम’ के सदस्य बन गये थे। एक बार संगम में किसी ने कह दिया कि जैन कवि शृंगार रस प्रधान काव्य-रचना में असमर्थ होते हैं। इस पर युवा विद्वान तिरुतक्कदेवर ने स्पष्टीकरण किया कि जैन रचनाकार शृंगार रस प्रधान काव्य लिखने की योग्यता नहीं रखते, ऐसा कहना ठीक नहीं है। सच्चाई यह है कि वे इससे भी अधिक महत्व के विषयों पर लेखनी चलाते हैं। इस बात से संगम के सदस्य संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने युवा कवि तिरुतक्कदेवर की हँसी उड़ाई और उन्हें चुनौती दी। तिरुतक्कदेवर ने अपने गुरु की आज्ञा लेकर चुनौती स्वीकार की। इसी चुनौती के फलस्वरूप उन्होंने ‘जीवक चिंतामणि’ महाकाव्य की रचना की। चार पंक्तियों के कुल 3145 पदों के इस ग्रंथ में कवि ने पहली बार विरुत्तम (वृत्त) छंद का प्रयोग किया।
जब यह महाकाव्य संगम में प्रस्तुत हुआ तो विद्वान चकित हो गये। कुछ पंडितों ने तिरुतक्कदेवर के चरित्र पर सवाल किया कि ब्रह्मचर्य और सादगीमय जीवन जीने वाला युवाकवि ऐसा शृंगार रस प्रधान काव्य कैसे लिख सकता है? इस पर तिरुतक्कदेवर की परीक्षा ली गई। निर्दोष सिद्ध करने के लिए उनकी हथेली पर अग्नि से लाल तप्त लोहे का एक गोला रखा गया और कहा गया कि यदि वे अपवित्र हैं तो उनका हाथ जल जाए! तिरुतक्कदेवर अपनी इस परीक्षा में पूर्ण उत्तीर्ण हुए। संगम के सभी सदस्यों ने तिरुतक्कदेवर की विलक्षण काव्य-प्रतिभा का लोहा माना।
संस्कृत, तमिल, हिंदी और मराठी के विद्वान श्रीनिवासाचार्य के अनुसार ‘‘जीवक चिंतामणि के पद-लालित्य और अर्थ-गौरव के साथ होड़ करने वाला दूसरा महाकाव्य अब तक तमिल में नहीं हुआ।’’ डॉ. एम. शेषन के शब्दों में- ‘‘इस काव्य में विशेष सौन्दर्य के कारण तमिल भाषा में एक नई आभा प्रदर्शित हुई। वास्तव में तमिल भाषा और साहित्य के लिए यह एक अमूल्य अवदान माना जाता है। कल्पना की सुंदरता, विचारों की गहराई, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि काव्यालंकारों के सुंदर प्रयोग से यह एक अतुलनीय काव्य बन गया।’’ नौवीं सदी के इस शृंगार-शांत रस प्रधान महाकाव्य का प्रभाव तमिल भाषा की प्रथम कम्ब रामायण पर भी हुआ। परवर्ती कवियों के लिए यह आदर्श अनुकरणीय ग्रंथ बन गया।
- डॉ. दिलीप धींग
शसुन जैन कॉलेज, चेन्नई-17
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