वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और दानवीर भामाशाह बालसखा थे। प्रताप के पिता राणा उदयसिंह का उनकी एक रानी पर अधिक मोह था। उन्होंने उस रानी के पुत्र जगमाल को युवराज बना दिया था। प्रताप को तो यही लग रहा था कि उन्हें राजगद्दी नहीं मिलेगी। उदयसिंह के निधन के बाद प्रताप के राजतिलक की चर्चा हुई। उस समय प्रताप के धनी-मानी मित्र भामाशाह ने प्रताप को मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठाने में पूर्ण योगदान किया।
अकबर ने प्रताप को कमजोर करने के लिए कई लोगों को अपने पक्ष में कर लिया था। अकबर के प्रलोभन में प्रताप के भाई और अनेक राजपूत भी अकबर से जा मिले। अकबर ने प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी भामाशाह को भी अपने पक्ष में करने के खूब प्रयत्न किये। लेकिन देशभक्त भामाशाह ने अकबर के वैभवशाली जीवन के सारे प्रलोभनों को ठुकराकर प्रताप के साथ मैत्री को निभाया।
धन के अभाव में जब प्रताप चिंतित थे तब, विपदा की घड़ियों में भामाशाह ने अपनी समस्त निजी संपत्ति महाराणा को समर्पित करके इतिहास की धारा ही मोड़ दी। जैन धर्मावलम्बी भामाशाह ने हल्दीघाटी युद्ध में अपना शौर्य प्रदर्शित करके यह सिद्ध किया कि अहिंसा, वीरता की पर्याय है। दिवेर युद्ध-विजय में भी त्याग व तलवार के धनी भामाशाह और उनके अनुज ताराचंद की मुख्य भूमिका रही थी। हल्दीघाटी युद्ध में घायल महाराणा प्रताप को युद्ध के मैदान से सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने में भी भामाशाह और ताराचंद ने गहरी सूझबूझ और त्वरित निर्णय-क्षमता का परिचय दिया था।
हल्दीघाटी युद्ध के बाद प्रताप ने भामाशाह को मेवाड़ का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। महाराणा के इस निर्णय से मेवाड़ की चहुँमुखी प्रगति के द्वार खुल गये। मेवाड़ उद्धारक भामाशाह और महाराणा प्रताप ने अपनी मित्रता को विकट से विकट घड़ियों में भी आजीवन निभाया। किसी भी प्रकार का सुख-दुःख उनकी मैत्री में बाधक नहीं बना। दोनों महापुरुषों की मैत्री महान लक्ष्य को समर्पित रही।
- डॉ. दिलीप धींग
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