समस्त तमिल लोकजीवन में सामाजिक समरसता का महान पर्व है- पोंगल। इसे तीन दिनों तक मिलजुलकर मनाया जाता है। इस पर्व के उपलक्ष्य में तीन दिन तक राजकीय अवकाश रहता है। इसका एक दिन तिरुवल्लुवर दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो विख्यात तमिल नीतिग्रंथ तिरुकुरल के रचनाकार थे। जैन विद्वान तिरुवल्लुवर ने तिरुकुरल में बड़े ही सुंदर तरीके से वर्षा, खेती-बाड़ी और शाकाहार का अंतर्संबंध और महत्व बताया है। जैन ग्रंथों के अनुसार प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने सभ्यता के आरंभ में लोगों खेती करना सिखाया और शाकाहारी जीवनशैली का प्रतिपादन किया। तमिलनाडु में यह प्रभाव कई रूपों में देखा जा सकता है।
पोंगल के बहुत सारे लौकिक और सामाजिक पक्षों में एक पक्ष यह है कि यह पर्व मवेशियों के प्रति प्रेम और आभार व्यक्त करने का पर्व भी है। मासिक तमिल पत्रिका ‘मुकुडै’ के संपादक प्रो. कनक अजितदास जैन के अनुसार गांवों में रहने वाले अधिकांश तमिल जैन बंधुओं का मुख्य व्यवसाय खेती है और हर परिवार में गाय, भैंस आदि पशु भी उनके परिवार के सदस्यों की तरह रहते हैं। ये मवेशी उनकी खेती-बाड़ी में सहयोगी होते हैं।पोंगल के दौरान एक दिन मवेशियों के प्रति आभार प्रकट किया जाता है। उन्हें सजाया जाता है, अच्छा खिलाया-पिलाया जाता है एवं एक दिन के लिए किसी भी कार्य में नहीं लगाया जाता है। वस्तुतः पोंगल के उपलक्ष्य में मवेशियों को भी काम से अवकाश दिया जाता है। सजे-धजे मवेशियों को गांव में घुमाया जाता है। जिसका मवेशी अधिक स्वस्थ, प्रसन्न और बढ़िया होता है, उसकी प्रशंसा होती है, जिससे उपकारी पशुओं की उचित देखभाल की सबको प्रेरणा मिले। यह परंपरा समस्त तमिल समुदाय में है। पोंगल के अनेक खूबसूरत पहलुओं में मनुष्येत्तर प्राणियों के प्रति कृतज्ञता का पक्ष सचमुच बहुत ही रोचक और प्रेरक है।
- डॉ. दिलीप धींग
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